Saturday, November 11, 2017

वही शाम है....


शाम उतर गयी पेड़ों के पीछे। मन भी धुँधलाया सा है जैसे कम रोशनी में आँखों को थोड़ी तकलीफ़ होती है स्पष्ट देखने के लिए।
मैं भी समझ नहीं पायी हूँ कुछ रिश्तों का ताना-बाना। बार-बार कुछ जुड़ता है...टूटता है। आस भी बड़ी अजीब चीज़ होती है ..ज़िद्दी...टूट के फिर जुड़ जाती है एक बार और टूटने के लिए।
वही शाम है, दिन नया पर बात वही। तोड़ दो....दिल वही है जज़्बात भी वही ।

Thursday, November 9, 2017

तुम मेरे हो..............



शर्ट ख़रीदा उस दिन । अपनी फ़ेवरेट ब्लू जीन्स के साथ व्हाइट शर्ट। झक्क सफ़ेद। उसने कहा - 'एकदम व्हाइट शर्ट क्यों पहनती हो। कोई प्रिंट लेना था। कुछ लिखा ही होता तो क्या बुरा था ...'
मैंने कहा- पेन देती हूँ। तुम ही लिख दो। देखूँ ज़रा क्या लिखते हो .....

'You aur mine '...बस ये तीन शब्द लिख दूँगा मैं। घूमती रहना फिर पहन के।


अब भी रखा है संभालकर वो शर्ट। बिलकुल ख़ाली है। मगर जब भी हाथ में लेती हूँ....प्रिंट दिखता है ....
❤️U you Are mine ❤️

Monday, November 6, 2017

पास नहीं कोई...


दुनिया के शोर से
ऊबा हुआ मन
एकांत तलाशता है
जब उस एकांत का
शोर भी
बहुत तीखा हो जाता है
तो आवाज़ लगाता है
उसे
जिससे उम्मीद हो कि
इन सब से परे ले जाएगा
मगर
दुनिया अपने मन के जैसी
नहीं होती
आपको दुनिया के साथ- साथ
ख़ुद से भी लड़ना होता है
क्योंकि
ज़रूरत के वक़्त आप
कभी किसी को पास नहीं पाएँगे ।

Thursday, November 2, 2017

शाम नहीं बदलती कभी


तुम्हारे नाम की शाम 
अब तक है मेरे पास 
नहीं सौंप पायी किसी को भी 
अपनी उदासी 
अपना दर्द, अपना डर 
और अपना एकांत भी
बस करती रही इंतज़ार
ना तुम लौटे
ना कोई आ पाया जीवन में
तुम्हारे नाम सौंपी गयी शाम पर
किसी और का नाम
कभी लिख नहीं पायी
वो वक़्त
अधूरा ही रहा जीवन में
कुछ के रास्ते बदल जाते हैं
कुछ की मंज़िले
मगर किसी-किसी की शाम
नहीं बदलती कभी ।

Wednesday, November 1, 2017

जड़ें जमती नहीं...


जड़ें कहीं जमती नहीं
तो पीछे कुछ भी नहीं छूटता
ज़िंदगी ख़ानाबदोश सी
रही अब तक
जब तक रहे, वहीं के हुए
फिर कहीं के नहीं हुए
लगता है इस बार
जड़ें जम गईं हैं गहरे तक
कष्ट होता है
निकलने में, बढ़ने में
छूटने का अहसास
लौटा लाता है बार-बार
जंगल सी खामोशी
महसूस होती है
कई बार आसपास
रात विचरते किसी पक्षी
की तरह
कोई चीख़ उठता है
मैं हूँ, रहूँगा, हाँ ....रहूँगा
मोमबत्ती की लौ
थरथरा उठती है कमरे में
फीकी चाँदनी में
सरसराते हैं चीड़ के पत्ते
कोई जाता दिखता है
उसी क्षण लौटता भी
एक दर्द उभरता है
जो आनंद में भी उपजा था
जो पीड़ा में भी है
यह जम जाने का दर्द है
किसी के भीतर
उतरने का आनंद है
कौन बाँध गया खूँटे से
जिसे भुलाना है
वो और याद आता है
जो याद रहता है हर पल
उसे भूल जाने की ख़्वाहिश है
कौन आवाज़ देता है
जाने क्या-क्या छूटता सा लगता है।

Wednesday, October 11, 2017

धागा




धागा, 
जो प्रेम का होता है 
धागा, 
जो मोतियाँ पिरोता है 
धागा, 
जो फूलों की माला गूँथता है
वही धागा
माटी को माटी से जुदा करता है
अलग रूप, अलग रंग,
अलग आकार देता है
धागा,
जोड़ता ही नहीं, तोड़ता भी है
जैसे प्रेम में
सँवरते नहीं,कुछ बिखर भी जाते हैं
माटी का तन
माटी में मिलना है एक दिन
सब जानते हैं
किसी का
सोने सा मन माटी हो जाता है
धागा,
प्रेम का हो या कुम्हार का
जोड़ता ही नहीं तोड़ता भी है ।

Thursday, September 7, 2017

ओ साथी


ओ साथी
तेरे इंतज़ार में गिन रहे
समुद्र की लहरें
जाने कितने समय से
समेट लो अपने डैने
मत भरो उड़ान
लौट आओ वापस
समुद्र वाली काली चट्टान पर
जहाँ समुन्दर का
निरंतर प्रहार भी
पथ से विचलित न कर पाया
मैं थमा हूँ अब भी
मेरी एकाग्रता और इंतज़ार की
मत लो और परीक्षा
कि आना ही होगा एक दिन और
ये न हो कि ना मिलूँ तुमको, फिर कभी।

Saturday, September 2, 2017

वो नहीं भूलती....


अपनी अँगूठी
कहीं रखकर भूल गयी
भूल जाती है अक्सर
वो इन दिनों
दराज़ की चाबी कहीं 
कभी गैस पर कड़ाही चढ़ाकर
कई बार तो
गाड़ी चलाते वक़्त
चौराहे पर रूककर सोचने लगती है
कि उसे जाना कहाँ था
वो भूलती है
बारिश में अलगनी से कपड़े उतारना
चाय में चीनी डालना
और अख़बार पढ़ना भी
आश्चर्य है
इन दिनों वो भूल गयी है
बरसात में भीगना
तितलियों के पीछे भागना
काले मेघों से बतियाना और
पंछियों की मीठी बोली
दुहराना भी
मगर वो नहीं भूली
एक पल भी
वो बातें जो उसने की थी उससे
प्रेम में डूबकर
कभी नहीं भूलती वो
उन बातों का दर्द और दंश
जो उसी से मिला है
फ़रेब से उगा आया है
सीने में कोई नागफनी
वो नहीं भूलती
झूठी बातों का सिलसिला
सच सामने आने पर किया गया
घृणित पलटवार भी
घोर आश्चर्य है
कैसे वो भूल जाती है
हीरे की महँगी अँगूठी कहीं भी रखकर
कई बार तो ख़ुद को भी भुला दिया
मगर नहीं भूलती
मन के घाव किसी भी तरह ।

Wednesday, August 30, 2017

गलत ईंट




दर्द
इतना हल्‍का भी नहीं
कि
शब्‍दों के गले लग
रो ले
मिट जाए।
रेशे-रेशे में रवां है
जो
दिया तुमने
और अनचाहे ही
स्‍वीकारा मैंने।
एक सूत बराबर थी
खाई
जोड़ने के बजाय
दो ईंट तुमने हटाईं
दो मैंने
खिसकाई।
अब
टूटा जुड़ता नहीं
खालीपन
भरता नहीं
खिसकी ईंटो से
कमजोर हो रही
अभेद इमारत।
गिर जाएंगी
एक दिन
सीली हुई दीवारें
दरका हुआ मन।
वक्‍त की
हल्‍की हवा भी
सह नहीं पाती
ढह जाती हैं वो दीवारें
जिसकी नींव में
एक ईंट
गलत लग गई हो भूल से......।

Monday, August 28, 2017

चुप की छाया


चुप की छाया ने
निगल लिया उस वक़्त को
जो एक खूबसूरत
लम्हा बन सकता था।
समय भी
हरसिंगार सा
झड़ता है धरती पर
और धूल में लिपट जाता है।
रात हसीन लगती है
जब
आँखों में कोई ख्वाब हो
और नींद से दुश्मनी हो जाए
कुछ आँखो को
सपने गिराने की आदत होती है
खो जाने के बाद सब स्वीकारना
अकेलपन से किया समझौता है।